इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश गोवध निवारण अधिनियम के तहत वाहन की अवैध जब्ती को नागरिक के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन माना है। कोर्ट ने गाजीपुर के डीएम और वाराणसी संभाग के कमिश्नर के वाहन जब्ती के आदेशों को रद्द कर दिया। साथ ही पीड़ित वाहन मालिक को मार्च 2025 से वाहन वापस सौंपने की तिथि तक 25 हजार रुपये प्रति माह मुआवजा देने का आदेश दिया।

यह आदेश न्यायमूर्ति संदीप जैन की एकल पीठ ने आशीष कुमार कन्नौजिया की याचिका पर दिया है। गाजीपुर निवासी याची के वाहन को नोनहरा थाने की पुलिस ने मार्च 2025 में गश्त के दौरान प्रतिबंधित पशु ले जाने के आरोप में पकड़ा था। इसी मामले में गाजीपुर के डीएम ने सितंबर 2025 में वाहन को जब्त करने का आदेश जारी कर दिया। फरवरी 2026 में वाराणसी संभाग के कमिश्नर ने भी डीएम के आदेश को सही ठहराया। इन आदेशों को याची ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।

याची के अधिवक्ता प्रवीण कुमार सिंह ने दलील दी कि वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश गोवध निवारण अधिनियम का दुरुपयोग किया जा रहा है। राज्य के भीतर गोवंश परिवहन के लिए परमिट की जरूरत नहीं है। ऐसे में याची का वाहन जब्त करने का आदेश को रद्द किया जाना चाहिए। हाईकोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश गोवध निवारण अधिनियम के तहत राज्य के भीतर कहीं भी जानवरों के परिवहन पर कोई पाबंदी नहीं है और न ही इसके लिए किसी परमिट की जरूरत है।

महज आशंका के आधार पर किसी नागरिक की संपत्ति को जब्त नहीं किया जा सकता। पुलिस की वजह से याची को आजीविका के साधन से वंचित होना पड़ा, जो संपत्ति के अधिकार का सीधा उल्लंघन है। कोर्ट ने 25 हजार रुपये प्रतिमाह की दर से मुआवजा लगाया। साथ ही कहा कि राज्य सरकार चाहे तो राशि को संबंधित अधिकारियों से वसूल कर सकती है, जिन्होंने कानून की अनदेखी करते हुए अवैध आदेश पारित किया था।

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